21/08/2026
अलकनंदा नदी ने श्रीनगर में छोड़े अपने छह निशान, धरती में दर्ज है नदी का हजारों साल पुराना इतिहास
श्रीनगर की घाटी में अलकनंदा ने छोड़ीं अपनी छह प्राचीन सरिता वेदिकाएं
वरिष्ठ जियोलॉजिस्ट प्रो. एमपीएस बिष्ट ने बताया नदी की भू-आकृतियों और पेलियो चैनल का महत्व, नवागंतुक भू-विज्ञान छात्रों के लिए बताया क्षेत्रीय ज्ञान को उपयोगी
श्रीनगर गढ़वाल। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के वरिष्ठ जियोलॉजिस्ट प्रो. एमपीएस बिष्ट ने अलकनंदा नदी की भू-आकृतियों को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि श्रीनगर की चौड़ी घाटी में नदी के लंबे समय से चले आ रहे प्रवाह और उसके द्वारा किए गए कटाव व निक्षेपण की प्रक्रिया के प्रमाण आज भी स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं। घाटी में अलकनंदा नदी द्वारा निर्मित छह प्रमुख सरिता वेदिकाएं (River Terraces) तथा कई स्थानों पर पुराने नदी मार्ग यानी पेलियो चैनल (Paleo Channel/Fossil Valley) मौजूद हैं।
प्रो. बिष्ट के अनुसार अलकनंदा का पारंपरिक उद्गम बदरीनाथ-माणा गांव से करीब 14-15 किलोमीटर ऊपर सतोपंथ-भागीरथ खरक हिमनदों के संगम स्थल अल्कापुरी से माना जाता रहा है। हालांकि हिमनदों के पिघलने की गति में वृद्धि के कारण वर्तमान में सतोपंथ और भागीरथ खरक हिमनदों के मुहानों से अलग-अलग जलधाराएं निकलती दिखाई देती हैं।
उन्होंने बताया कि हिमालयी नदियां अपने प्रवाह के दौरान दो प्रमुख भू-वैज्ञानिक कार्य करती हैं—पहला चट्टानों और भूमि का कटाव तथा दूसरा अनुकूल स्थान मिलने पर अपने साथ लाई गई गाद और मलबे का निक्षेपण। इसी प्रक्रिया से नदी घाटियों में सरिता वेदिकाओं का निर्माण होता है।
श्रीनगर में छह स्तरों पर दिखाई देती हैं सरिता वेदिकाएं :
प्रो. बिष्ट के मुताबिक श्रीनगर की चौड़ी अलकनंदा घाटी में नदी के दोनों किनारों पर तलछट के छह अलग-अलग स्तर देखे जा सकते हैं। नदी के बाएं किनारे एसएसबी क्षेत्र से डांग-डोभालधारा और विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आवास के ऊपर तक इन सरिता वेदिकाओं को देखा जा सकता है। वहीं चौरास परिसर के पुल से कुलपति आवास तक भी इनके समान स्तर मौजूद हैं।
उन्होंने कहा कि प्राचीन समय में मानव बस्तियों के विकास में इन नदी निक्षेपों की महत्वपूर्ण भूमिका रही होगी। कृषि, आवास और चारागाह के लिए इन क्षेत्रों का उपयोग किया गया। इसी दृष्टि से श्रीनगर जैसे प्राचीन नगर का विकास भी अलकनंदा की चौड़ी घाटी में होना महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
पुराने नदी मार्गों के प्रमाण भी मौजूद:
प्रो. बिष्ट ने पेलियो चैनल को नदी का वह पुराना मार्ग बताया, जिसका इस्तेमाल नदी वर्तमान से पहले करती थी। इसे फॉसिल वैली भी कहा जाता है। श्रीनगर घाटी में उफल्डा और सुपाणा पुल के आसपास इसके अच्छे उदाहरण देखे जा सकते हैं। इसके अलावा रुद्रप्रयाग-कोटेश्वर, गौचर और छटवांपीपल क्षेत्र में भी अलकनंदा के पुराने नदी मार्गों के प्रमाण दिखाई देते हैं।
उन्होंने बताया कि भू-आकृतियों का अध्ययन केवल अकादमिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इनके आधार पर क्षेत्र में कृषि, निर्माण और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग को भी समझा जा सकता है।
निर्माण के लिहाज से पेलियो चैनल, टेरेस से अलग :
प्रो. बिष्ट के अनुसार सरिता वेदिकाओं की मिट्टी में रेत की मात्रा अधिक होने के कारण ये कृषि के लिए हर स्थान पर अत्यधिक उपजाऊ नहीं होतीं। वहीं भूकंपीय दृष्टि से भी इन क्षेत्रों की संवेदनशीलता को समझना जरूरी है। दूसरी ओर पुराने नदी मार्ग यानी पेलियो चैनल सामान्यतः निर्माण की दृष्टि से अपेक्षाकृत मजबूत माने जा सकते हैं और इन पर भूकंप का प्रभाव सरिता वेदिकाओं की तुलना में कम हो सकता है, हालांकि इनकी कृषि उपयोगिता सीमित रहती है।
उन्होंने चिंता जताई कि वर्तमान समय में नदी की इन भू-आकृतियों और तलछटी क्षेत्रों का अनियंत्रित खनन के लिए उपयोग किया जाना इनके भू-वैज्ञानिक महत्व को प्रभावित कर सकता है।
प्रो. बिष्ट ने कहा कि श्रीनगर और आसपास की इन भू-आकृतियों का अध्ययन क्षेत्रीय भू-विज्ञान को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। विशेषकर भू-विज्ञान के नवागंतुक छात्रों के लिए यह क्षेत्र एक प्राकृतिक प्रयोगशाला की तरह है, जहां नदी के कटाव, निक्षेपण, पुराने नदी मार्ग और घाटी के विकास की प्रक्रियाओं को प्रत्यक्ष रूप से समझा जा सकता है।